Wednesday, January 20, 2021
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सरकार की दो मुही नीती गन्ने का करोड़ों का भुगतान अभी भी लटकाए हैं सहकारी चीनी मिलें, और सरकार कर रही है किसान कल्याण की बात ।

-यूनियनिस्ट राकेश सांगवान

कुछ दिन पहले सहकारी समिति सुगर मिल्स , यूपी के जी॰एम॰ श्री अमेंद्र सिंह पोरस जी से बात हो रही थी । पोरस जी अपनी रिटायरमेंट के बाद किसानों के बारे में एक प्रोग्राम चलाने के बारे में चर्चा कर रहे थे । चर्चा के दौरान किसान आंदोलन और यूपी में गन्ना किसानों और सुगर मिलों की बात चल पड़ी । मैंने पोरस जी से पुछा कि यूपी में गन्ना किसानों को मिलें भुगतान क्यों नहीं करती ? पोरस जी ने बताया कि यूपी में दो तरह की सुगर मिलें हैं , व्यापारियों की व दूसरी सहकारी मिलें । किसानों का जो रोला है वह व्यापारियों की मिलों से है क्योंकि इनकी देनदारियाँ साढ़े सात हज़ार करोड़ की है , जबकि सहकारी मिलों की चार सो करोड़ की । मैंने पुछा , चार सो करोड़ भी बड़ी रक़म है , यह क्यों बक़ाया है ? तो उन्होंने बताया कि यह भी कोरोना की वजह से बक़ाया है , सरकार ने रोक दी ।

अब इसमें दो बातें हैं पहली तो यह कि कोरोना में भी सरकार किसानों की रक़म रोक कर परोपकारी बन रही है और फिर इन्हीं किसानों को ठंड में धरनो पर बैठने को मजबूर कर रखा है ।

दूसरी यह कि यूपी की इन सुगर मिलों के बक़ाया से भी तीन नए कृषि क़ानूनों को समझा जा सकता है कि ये क़ानून कितने किसान हितैषी हैं । नए कृषि क़ानूनों में सरकार किसान को सीधा बाज़ार के हवाले करना चाहती है । और सरकार अपने इस क़दम को क्रांतिकारी क़दम बता रही है । पर सरकार के इस क्रांतिकारी क़दम की पोल यूपी की सुगर मिलें ही खोल रही हैं । जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी किसानों को पुरा भुगतान नहीं कर रहे । और सरकार के क्रांतिकारी क़दम में सरकार किसान को अपने ही एक मुलाजिम (एसडीएम) से न्याय का भरोसा दिला रही है ?

किसान को सीधा व्यापारियों के हवाले करने की बजाए सरकार को चाहिए कि वह अपनी एजेंसियों व सहकारी समिति सिस्टम को मज़बूत व दुरुस्त करे ।

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