Wednesday, January 27, 2021
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सत्ता के विरुद्ध किसान के संघर्ष पर धर्म का कवर चढ़ाने का हथकंडा नया नहीं है

यूनियनिस्ट राकेश सांगवान

1935 में सीकर में किसान आंदोलन हुआ और इसमें आख़िर में राजा को किसानों के आगे झुकना पड़ा और लगान पर छूट को लेकर फ़ैसला सुनाया कि यह छूट सिर्फ़ खालसा लैंड के सम्बंध में है ।

मुग़लकालीन शासन में ज़मीन को तीन हिस्सों में बाँटा गया था ।

  1. खालसा लैंड – यह वह ज़मीन होती थी जिस पर बादशाह का सीधा अधिकार होता था , इससे प्राप्त होने वाला लगान राज्य के शाही ख़ज़ाने में जमा होता था ।
  2. जागीर – यह वह ज़मीन होती थी जो राज्य के प्रमुख कर्मचारियों को उनकी तनख़्वाह के बदले में दी जाती थी । इस ज़मीन से प्राप्त होने वाले लगान पर इनका अधिकार होता था । जागीर को कभी भी खालसा लैंड में तब्दील किया जा सकता था और खालसा लैंड को कभी भी जागीर में ।
  3. सयूरगल लैंड – अनुदान में दी जाने वाली ज़मीन को सयूरगल ज़मीन कहा जाता था । इससे लगान वसूल नहीं किया जाता था । यह ज़मीन धार्मिक प्रवृति के लोगों को अनुदान के रूप में दी जाती थी । इसे ‘मदद-ए-माश’ भी कहा जाता था ।

जहांगीर काल में खालसा ज़मीन का रक़बा कुल रकबे का 1/9 भाग था , जो औरंगज़ेब शासनकाल में बढ़कर कुल रकबे का 1/5 भाग हो गया था । उस दौर में लगान में जाति के हिसाब से भी भारी अंतर था । जाट , मेव , मीणा , गुर्जर , अहीर आदि जितनी भी किसान जातियाँ थी इन्हें 76% तक राजस्व देना पड़ता था तो राजपूत को 33% व ब्राह्मण को 12% । यही कारण है कि उस ज़माने में जाट या अन्य किसान जातियाँ ही राज के विरुद्ध बग़ावत करती थी । औरंगज़ेब शासनकाल में खालसा लैंड का रक़बा ज़्यादा बढ़ा दिया गया था जिस कारण उसके शासनकाल में मथुरा आगरा के किसानों ने गोकुला जाट की अगुवाई में बग़ावत की , जिसमें जाट , गुर्जर , अहीर , राजपूत , सैनी , मेव सब शामिल थे । नारनौल में साधो ने बग़ावत की । और ख़ास बात ये कि आज कि पीढ़ी को संघियों ने इतिहास रटाया कि औरंगज़ेब के विरुद्ध धर्म युद्ध था क्योंकि वह हिंदुओं पर अत्याचार करता था , सवा मण जनेऊ की कथा चलाई । जबकि यह आधा अधूरा सच था । यदि औरंगज़ेब के साथ धर्म युद्ध था तो इन किसानों की शाही फ़ौज के विरुद्ध लड़ाई में हिंदू राजा औरंगज़ेब का साथ क्यों दे रहे थे ? दरअसल लड़ाई आर्थिक थी जिसका ये लोग कभी नहीं बताते कि किस प्रकार जातीय आधार पर भी राजस्व वसूली में फ़र्क़ था , इस वसूली में सबसे ज़्यादा कौन लुट रहा था । और हमारी आज कि युवा पीढ़ी इन संघियों के प्रचारित जाल में उलझ कर अपने ही पुर्खों को कायर सिद्ध करने पर आमादा है कि तलवार के डर से मुस्लिम बन गए ! यदि बात तलवार के डर की थी तो व्यापारी पहले यह अपनाता ! उस समय का रेवेन्यू रिकोर्ड खंगाले तो समझ आ जाएगा कि धर्म तो बाद की बात थी पहली लड़ाई आर्थिक थी । हाल के किसान आंदोलन में वक्ताओं से अक्सर सुनने को मिलता है कि बाबा बंदा सिंह बहादुर ने हमें ज़मीन का मालिक बनाया । तो ये ज़मीन का मालिकाना हक़ वही खालसा लैंड वाला मामला था ।

तब भी लड़ाई आर्थिक थी , जिसे धर्म के ठेकेदारों ने धर्म की आड़ में छिपाने की कोशिश की और उस पर धर्म का जिल्द चढ़ा दिया । आज भी किसान की लड़ाई आर्थिक ही है , जिस पर इन्होंने ख़ालिस्तानी का प्रचार कर धर्म का जिल्द चढ़ाने की कोशिश की । धर्म तो ख़ैर कोई भी राज हो साथ चलेगा क्योंकि शासक के यह कई तरह के काम आता है । तब भी आता था अब भी आ रहा है । और यदि कोई इस जिल्द के अंदर झाँकने की कोशिश करे तो फिर राष्ट्रवाद का जिल्द है ही ।

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