Friday, January 22, 2021
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लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाती सरकारें, किसानों को किनारे लगाने पर तुली ।कृषी बिलों के आने से पहले ही कैसे बना लिए अडानी ने विशालकाय गोदाम

ख़ान का बखान


ए, एस, ख़ान

लखनऊ कृषी को लेकर सरकार द्वारा लाए गए तीन अध्यादेशों पर पूरे देश में घमासान मचा है, किसानों के 32-से अधिक संगठन लगातार आंदोलनरत हैं, सरकार के साथ कई दौर की बातचीत बेनतीजा निपट चुकी है ।
सरकार अभी भी किसानों के साथ बात करने को लगातार कह रही है, तथा किसानों की शंकाओं को दूर करने को लेकर संशोधन भी करने को तैयार है, किंतु किसान तीनों अध्यादेशों को वापस लेने से कम पर तैयार नहीं।
सरकार जिस तरह से कह रही है कि ये तीनों बिल किसानों के हित में हैं, और सरकार किसानों की हर शंका को दूर करने हेतु बातचीत को तैयार है ।
सवाल यह है कि जब ये तीनों बिल किसानों के हित में है और सरकार शंकाओं को दूर करने हेतु बातचीत को भी तैयार हैं, तो ये पहल सरकार ने बिल लाने से पहले क्यों नहीं की ।
जिस तरहां से घटनाक्रम घट रहे हैं और जो परिदृश्य उभर रहे हैं उसके अनुसार ये तीनों कृषी संबंधित अध्यादेश किसानों के हित में नहीं, बल्की गौतम अडानी, और अंबानी जैसों के हितों को ध्यान में रखते हुए लाए गए हैं, और सरकार ने बिल लाने से पहले इन्हीं उधोगपतियों से ही चर्चा भी की है ।
यदी ऐसा नहीं होता तो देश भर में अडानी ने बड़े स्तर पर अनाज के भंडारण हेतु गोदामों का निर्माण अगस्त माह से ही करना कैसे शुरू कर दिया ।
यदि पिछले सात वर्षों का आंकलन किया जाए तो 2014- के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दस साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस को हाइटेक प्रचार में कोसों पीछे छोड़ दिया था, भाजपा ने प्रचार में करोड़ों अरबों रुपए जो फूंके वो इन्हीं धनाढ्यों से चंदे के रूप में मिले थे, ज़ाहिर है जिसने पैसा लगाया उसको लाभ भी पहुंचाना था, अतः सारी नीतियां मोटा चंदा देने वाले कारपोरेट जगत को ध्यान में रखते हुए बानाई जाने लगी ।
दूसरी ओर आम नागरिकों के लिए नैसर्गिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को ताक पर रख कर दमनकारी नीति अपनाई गई, जहां जनता को सवाल करने, विरोध करने पर देशद्रोही, घोषित किया जाने लगा ।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता सर्वोपरि होती है, कोई भी निती, कानून, जनता के हित को ध्यान में रखते हुए बनाए जाते हैं, किंतु वर्तमान सरकार चुनाव पूर्व किए गए सभी वादों को ताक पर रखकर दमनकारी नीतियों और विघटनकारी कानूनों को जनता पर थोप रही है, और विरोध करने पर जनता का दमन किया जा रहा है ।
ऐसा लगता है सरकार का लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास ही नहीं है, सरकार हिटलरशाही तरीके से संचालित हो रही है, जहां विरोध करना सवाल पूछना सबसे बड़ा अपराध घोषित किया जा रहा है ।
यदि सरकार किसान संबंधित कानूनों को किसान हित में मान रही है, तो किसानों के विरोध पर कानून वापस लेने में हिचक क्यो रही है, जाहिर है कारपोरेट जगत का दबाव है, जिसने अनाज को जमा करने हेतु बड़े बड़े गोदाम पहले से ही बना कर रखें हैं ।
यदि सरकार किसानों की मांगों को मानकर तीनों कृषि संबंधी अध्यादेशो को वापस लेती है तो अडानी अंबानी आदी कारपोरेट घरानों के हितों का क्या होगा ।
सरकार जिस तरह से निजीकरण को बढ़ावा दे रही है उससे तो यही लगता है कि सरकार देश को इस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों के आधार पर चलाना चाहती है, जहां आम आदमी के लिए कोई संभावना नहीं बचेगी ।

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