Wednesday, January 27, 2021
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टुकड़ों में बंटे संघर्ष की नहीं, जरूरत है एक संगठित क्रांति की,देश गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है ।

अनूप सिंह जानकारी जक्शन लखनऊ

लखनऊ- देश का किसान अपने हक की लड़ाई के लिये सडको पर है, और देशवासी हैं जो फेस बुक और व्टसप पर कट-पेस्ट, फारवर्ड, में तो व्यस्त हैं, लेकिन सडक पर नही उतर सकते । क्योंकि उन्हें चापलूसी के अलावा कुछ नही आता है ।
ये वो देशवासी है जिनपर जब खुद पर कोई बात आती है तो कहते है कि शसन प्रशासन उसकी नही सुनता है, इस देश के लोगो को सहारे की जरूरत सी पड गयी है, जैसे कोई मसीहा आयेगा और उन्हे बचायेगा ।
लेकिन इन काहिलो को ये नही पता जब एक जनवर को कोई ज्यादा परेशान करता है तो वो भी अपने आप को बचाने हेतु कुछ ना कुछ करता है, और उस परेशानी से बहार निकल जाता है ।
यहां तो खुद जनता ही अपनी और देश की बरबादी की दासता लिखने में लगी हुई है, फिर से एक बार वही गुलाबी वाला शसन देखने को आतुर है, और नई पीढी को भी गुलामी की जंजीरों में बंधने को मजबूर कर रहे है ।
यहां नेताओ की कोई गलती नहीं, यहा जनता ही गलत है क्या कोई ये जानने की कोशिश करता है की गलत कौन है, जब भी मंहगाई या कोई अत्याचार बढ़ता है तो नेता ही धरनो पर बैठता है ।
क्या नेता की ही जिम्मेदारी होती है इन सब कार्यो की, क्या जनता की कोई जिम्मेदारी नही बनती, के आवाज उठाये, ।
आज जो ये किसान सडक पर उतरा है तो अपने और हजारों देशवासियों के लिये उतरा है जब किसना को उसकी फसल का उत्पादन मूल्य नही मिलेगा और जनता को उससे भी ज्यादा मूल्य चुकाना पडेगा तो जनता और किसान दोनो को महगाई की मार सहनी पडेगी जिससे फिर वही आजादी से पेहले वाली जिन्दगी जीने को मजबूर हो जायेंगे ।
खेर इससे जनता को क्या लेना देना, दुनिया में आगर आये हो तो जीना ही पडेगा ।
ये दर्द जनता ने खुद को दिया, है पीने को मजबूर करा है, यहाँ नेता नही है जिम्मेदार, जनता है, देश को बर्बाद करने को, आँखों से देख कर कानो से सुन कर ।
युवा को बेरोजगारी के कगार पर खडा कर दिया, देश बिक रहा है, रेलवे बिका, रेलवे की जमीन को बेचने में लगे है, एयरपोर्ट बेच दिये, और सरकारी विभाग बेचने मे लगे है, जब सरकार की सारी सरकारी कम्पनियाँ बिक जायेगी तो फिर सरकारी नौकरी कहा रहेगी ।
जब सब बिक गया है तो जिस व्यक्ति या कम्पनी ने खरीदा है तो वहाँ तो प्राइवेट ही नियुक्त करेगा ना की सरकारी नियुक्ति होगी ।
सारा खेल यही सम्पन्न ।
यही नीतियां हैं ।
समय है जनता भी सडक पर आये तभी सरकार और नेताओं को देशवासीयों की ताकत का पता चलेगा ।
इस समय किसानो को आप के सहयोग की जरूरत है ।
अगली बार जब भी मतदान हो तो बेलेट पेपर पर ही हो चुनाव आयोग को भी बता दे जनता जब अपनी पर आती है तो सैलाब लेकर साथ मे लाती है ।
जैसे आजादी के सुपूतो ने सुनामी में अंग्रेजो को बहा दिया था ।
ठीक उसी तरह इस चुनाओं में आयोग को भी बता दो ई.वी.एम नही अब बैलेट पेपर से कराओ चुनाव ।
इस समय किसान भीड में खडा है अपनी मंगो को लेकर आप भी खडे हो जाये किसानो के साथ कोरोना भाग गया, मंहगाई और भूख मरी दे गया ।
कहाँ गया कोरोना, जिससे जनता को डराया गया ।
भय के साये मे जनता को रखा गया ।
और अपनी मन मानी कर डाली ।सरकार मस्त किसान और जनता त्रस्त, या तो जनता खुद अपने हाथों से अपने बच्चों को ज़हर देकर खुद जेहर खा ले, या फासी लगा ले ।
या फिर कानून को अपने घर की दहलीज पर खडा अपना नौकर बनाये रखने वाले नेताओं को सबक सिखा दे, की हम अगर आपको ताज पहना सकते है तो जूतो की माला भी पहना सकते है और लात भी मार सकते है ।

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