Wednesday, January 27, 2021
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तीनों कृषि बिलों पर सुप्रीम रोक के आखिर क्या मानें हैं, कानून निरस्त क्यो नहीं

किसान कमेटियों के त्रीव विरोध के बाद भी कमेटी के गठन का क्या मतलब है
कमेटी के चारों सदस्य पहले ही बिल का समर्थन कर चुके हैं, ऐसे में कमेटी से निश्पक्षता की अपेक्षा कैसे
क्या फिर किसी सुप्रीम कोर्ट के जज को राज्यसभा भेजने की तैयारी है ।
ए, एस, ख़ान/ स्टेट हेड जानकारी जंक्शन उ-प्र-लखनऊ

लखनऊ केन्द्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषी बिलों पर किसानों का त्रीव विरोध एवं संघर्ष कड़ाके की ठंड में पैंतालीस दिनों से अधिक समय से जारी है ।
दूसरी ओर मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीनों कानूनों पर रोक, तथा मामले के समाधान के लिए चार सदस्यों की कमेटी का गठन, और कमेटी के सदस्यों के नामों ने अनेकों सवाल खड़े कर दिए हैं ।
जिस बात का अंदेशा था वो ही हुई , सुप्रीम कोर्ट ने नए बिलों पर रोक लगा दी और किसानों की आपत्ति के बावजूद कमेटी बना दी , सरकार भी यही चाहती थी कि कमेटी बने व किसानों को बांट दिया जाए और बिल वापसी लेने पर उनकी राजहठ पर बेइज्जती भी ना हो व उन्हे आंदोलन से निपटने को समय भी मिल जाए । अब सरकार ने गणतंत्र दिवस का बहाना बना कर किसानों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी लगाई है । सब कुछ सरकार की चाल के अनुसार हो रहा है ।

लगता है सरकार की कृपा से सुप्रीम कोर्ट के एक और जस्टिस सेवानिवृत्ति के बाद राज्य सभा सांसद बनने की तैयारी में है ।
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी के सदस्यों की असलियत जानिए

सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई है उसके बारे में आपकी सोच बिल्कुल ठीक है ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जिस कमेटी का गठन किया है. उसके चार में से तीन सदस्य पहले से ही कृषि कानूनों के बारे सरकार के पक्ष में अपनी राय जाहिर कर चुके हैं
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी में भूपिंदर मान सिंह मान, प्रेसिडेंट, अशोक गुलाटी एग्रीकल्चर इकोनॉमिस्ट,
डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, इंटरनेशनल पॉलिसी हेड, और अनिल धनवत, शेतकरी संगठन, महाराष्ट्र को शामिल किया गया है.

इसमे भूपिंदर मान सिंह मान बयोवृद्ध किसान नेता है पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं केवल वे ही इन।कानूनों के खिलाफ अपनी राय रख रहे हैं उनके अलावा जो तीनों सदस्य है वे सरकारी पिठ्ठू है

अशोक गुलाटी तो पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में कह चुके हैं कि ‘इन कानूनों से किसानों को अपने उत्पाद बेचने के मामले में और खरीदारों को खरीदने और भंडारण करने के मामले में ज्यादा विकल्प और आजादी हासिल होगी. इस तरह खेतिहर उत्पादों की बाजार-व्यवस्था के भीतर प्रतिस्पर्धा कायम होगी. इस प्रतिस्पर्धा से खेतिहर उत्पादों के मामले में ज्यादा कारगर मूल्य-ऋंखला (वैल्यू चेन) तैयार करने में मदद मिलेगी क्योंकि मार्केटिंग की लागत कम होगी, उपज को बेहतर कीमत पर बेचने के अवसर होंगे, उपज पर किसानों का औसत लाभ बढ़ेगा और साथ ही उपभोक्ता के लिए भी सहूलियत होगी, उसे कम कीमत अदा करनी पड़ेगी. इससे भंडारण के मामले में निजी निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा तो कृषि-उपज की बरबादी कम होगी और समय-समय पर कीमतों में जो उतार-चढ़ाव होते रहता है, उसपर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी.’

कमेटी के दूसरे सदस्य डॉ. प्रमोद कुमार जोशी के बारे में ज्यादा मालूमात तो नही चल रही है लेकिन वे कारपोरेट के आदमी दिख रहे हैं उनकी जितनी नियुक्तियां है वे दिखा रही है उनकी सोच क्या होगी वे सार्क एगरीकल्चर सेंटर्स गवर्निंग बोर्ड में चेयरमैन रहे हैं ।
बांग्लादेश तथा यूं,एन, कैपसा गवर्निंग बोर्ड इन बोगुर, में तथा इंटरगवर्नमेंटल पैनल आन द वर्ल्ड बैंक्स इंटरनेशनल एसेस्मेंट आफ़ एग्रिकल्चर साइंस में भी वह मेम्बर रहे हैं ।
टेक्नोलॉजी फार डेवलोप्मेंट इंटरनेशनल स्टीरिंग कमेटी फार दा क्लाइमेंट चेंज एग्रीकल्चर एंड फूड सिक्योरिटी चैलेंज प्रोग्राम आफ़ CGIAR से भी वह जुड़े हुए हैं, इसलिए आप समझ ही सकते हो कि उनकी सोच क्या होगी

चौथे सदस्य को तो आप पहचानते ही हो…. यह है अनिल धनवत, शेतकरी संगठन, महाराष्ट्र से

शेतकरी संगठन और इसके अध्यक्ष तो बिलकुल खुला समर्थन सरकार के तीनों कृषि कानूनों को दे चुके हैं जब आप सड़को पर बैठकर इसका विरोध कर रहे थे तो शेतकरी संगठन वाले कृषि क़ानूनों के समर्थन में रैलियाँ आयोजित कर रहे थे पटाखे फोड़। रहे थे ओर इसे जश्न के तौर पर मना रहे थे

शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवत इन बिलो को बड़ा सुधार बता चुके ओर कह रहे हैं कि इससे किसानों को वित्तीय आजादी मिलेगी. घनवत ने पिछले दिनों ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा है कि उनके कृषि संगठन ने बिल का समर्थन करने का निर्णय लिया है क्योंकि इन बिलों से किसानों को मदद मिलेगी.

साफ साफ दिख रहा है कि इस कमेटी की मंशा क्या है और ऐसी कमेटी बनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की मंशा क्या है ।

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